अशोक चक्र विजेता लेफ्टिनेंट त्रिवेणी सिंह को जानिये?

अशोक चक्र विजेता लेफ्टिनेंट त्रिवेणी सिंह को जानिये :


लेफ्टिनेंट त्रिवेणी सिंह का जन्म 1 फरवरी , 1978 को झारखंड के हुआ था । वह सेवानिवृत्त कैप्टन जनमेजय सिंह ठाकुर के पुत्र थे । उनकी माँ का नाम श्रीमती पुष्पलता था । वे लोग मूल रूप से पंजाब के पठानकोट के रहनेवाले थे । उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय , लुधियाना से कृषि विज्ञान में बी.एस.सी. की डिग्री प्राप्त की थी । 

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त्रिवेणी सिंह को 8 दिसंबर , 2001 को जम्मू एंड कश्मीर लाइट इन्फैंट्री में कमीशन प्राप्त हुआ।वे मार्शल आर्ट में पारंगत थे और अपने छात्र जीवन में ही राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीत चुके थे । लेफ्टिनेंट त्रिवेणी सिंह अपनी यूनिट के सहायक अधिकारी थे और जिस कमरे में वह थे , वह कमांडिंग ऑफिसर के ऑफिस के साथ लगा हुआ था । 

उन्हें जम्मू रेलवे स्टेशन पर आत्मघाती आतंकवादियों के आने की खबर मिली । कमांडिंग ऑफिसर ने उन्हें आदेश दिया कि वे अफसरों और सैनिकों को अलर्ट करें और सभी जम्मू रेलवे स्टेशन की ओर कूच करें । किंतु लेफ्टिनेंट त्रिवेणी सिंह को लगा कि इस पूरी प्रक्रिया में काफी विलंब हो सकता है , 

अत : उन्होंने उन आत्मघाती आतंकवादियों से निपटने के लिए त्वरित कारवाई दल को लेकर जाने की अनुमति माँगी । जब उनका दल रेलवे स्टेशन के पास से गुजरा तो उन्हें ज्ञात हुआ कि आतंकवादी तो अंधाधुंध गोलीबारी कर रहे हैं । उनकी गोलीबारी से सात लोग मारे जा चुके हैं और अनेक घायल हो चुके हैं । 

लेफ्टिनेंट त्रिवेणी सिंह ने तुरंत काररवाई की और अपने घातक कमांडोज को स्टेशन की घेराबंदी करने का आदेश दिया । इस प्रकार उन्होंने एक आतंकी को वहीं पर मार गिराया । इसके बाद उनकी निगाह रेलब्रिज के ऊपर से फायरिंग कर रहे एक आतंकवादी पर पड़ी । लेफ्टिनेंट त्रिवेणी सिंह उसकी ओर बढ़े । 

वे अब तक जान चुके थे कि यह आतंकवादी खतरनाक हथियारों से लैस है और पार्सल रूम में जमा हो चुके करीब 300 यात्रियों को मार सकता है । खतरे को भांपते हुए वह उस आतंकवादी की ओर झपट पड़े और उसका बड़ी बहादुरी से मुकाबला किया । उस मुठभेड़ में उनकी जान चली गई , किंतु उन्होंने बड़ी ही बहादुरी से उस खतरनाक आतंकवादी का मुकाबला किया और उसे भी मार गिराया ।

उनका मृत शरीर भी उस आतंकवादी की लाश के पास ही जा गिरा । लेफ्टिनेंट त्रिवेणी सिंह ने निर्दोष यात्रियों की जान बचाने के लिए अद्भुत शौर्य , पराक्रम और हौसले का परिचय दिया था । उनके त्वरित निर्णय से अनेक यात्रियों की जान बचाने के साथ - साथ घातक आतंकवादियों को भी मारा जा सका । 

उन्होंने अपनी बहादुरी और चतुराई का ऐसा प्रदर्शन किया कि मौत का खौफ फैलाने आए दोनों आतंकवादियों को ही मौत की नींद सोना पड़ा । लेफ्टिनेंट त्रिवेणी सिंह को मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया ।

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