परम वीर चक्र से सम्मानित सूबेदार संजय कुमार

परम वीर चक्र से सम्मानित सूबेदार संजय कुमार

परम वीर चक्र से सम्मानित सूबेदार संजय कुमार के बारे में जानिये? 

परम वीर चक्र वीरता का सर्वोच्च पुरस्कार है । यह पुरस्कार प्राप्त करने वाले शूरवीर निस्संदेह सही मायनों में विजेता होते हैं , क्योंकि वे अपना सर्वस्व समर्पित कर मातृभूमि की रक्षा करते हैं । सूबेदार संजय कुमार भी ऐसे ही भारतीय सेना के एक बहादुर सिपाही हैं । उनका जन्म 3 मार्च , 1976 को हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले के कलोल बल्किन ग्राम में हुआ ।


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 वे सेना में शामिल होना चाहते थे । सेना में शामिल होने से पहले उन्होंने दिल्ली में टैक्सी चालक का काम भी किया था । सेना में भर्ती होने से पहले उन्हें तीन बार अस्वीकृति का सामना भी करना पड़ा था । लेकिन उनके हौसले इतने बुलंद थे कि उन्होंने हार नहीं मानी और आखिर अपनी वीरता एवं जज्वे से सेना में शामिल होने के सपने को वास्तविकता में पूर्ण कर लिया । 


वे 4 व 5 जुलाई , 1999 को कारगिल में मस्को वैली पॉइंट 5875 पर फ्लैट टॉप पर 11 साथियों के साथ तैनात थे । यहाँ शत्रु ऊपर पहाड़ी से हमला कर रहा था । इस टीम में उनके 11 साथियों में से दो शहीद हो चुके थे।आठ गंभीर रूप से घायल थे । संजय कुमार अपनी राइफल के साथ शत्रुओं से कड़ा मुकाबला कर रहे थे । एक समय ऐसा आया कि उनकी राइफल की गोलियाँ खत्म हो गईं । इसी बीच उन्हें तीन गोलियाँ लगीं ।


इनमें से दो उनकी टाँगों में और एक गोली पीठ पर लगी हुई थी । वे बुरी तरह घायल हो चुके थे । ऐसी गंभीर स्थिति में उन्होंने तय किया कि उस ठिकाने को अचानक हमले से खामोश करा दिया जाए । इसी इरादे को मन में ठानकर वे उस जगह पर हमला करने के लिए उठ खड़े हुए । हिम्मत करते हुए वे उस स्थान पर पहुंचे और वहाँ पर उन्होंने हमला करके आमने सामने की मुठभेड़ में तीन दुश्मन सैनिकों को मार गिराया । 


इसके बाद वे दूसरे ठिकाने की ओर बढ़े । इस मुठभेड़ में वे बुरी तरह जख्मी हो गए । लेकिन उन्होंने अपनी परवाह न करते हुए शत्रुओं को मार गिराने के लिए उन पर टूट पड़े । अचानक हुए हमले से दुश्मन बौखला गए और भाग खड़े हुए । जल्दबाजी में शत्रु अपनी मशीनगन वहीं छोड़ गए । संजय कुमार ने उस मशीनगन को उठाया और शत्रुओं का मुकाबला करना आरंभ कर दिया । संजय कुमार की इस दिलेरी से उनकी टुकड़ी के जवानों में भी उत्साह एवं जोश भर गया । 


उन्होंने बेहद फुर्ती के साथ शत्रु के अनेक ठिकानों पर हमला बोल दिया । वे फ्लैट टॉप पर दुश्मनों से तब तक मुकाबला करते रहे , जब तक कि वह शत्रुओं से पूरा खाली नहीं हो गया । घायलावस्था में उन्हें सैनिक अस्पताल में भर्ती कराया गया । उनकी इस अद्भुत बहादुरी के लिए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1999 में परम वीर चक्र से सम्मानित किया । इस समय वे भारतीय सेना को अपनी सर्वोच्च सेवाएँ दे रहे हैं।

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